बुधवार, 18 नवंबर 2009

सुन जरा-सा ..!

ओ सजीले, नयन नीले, अधर तेरे हैं रसीले....
सुन ज़रा-सा, स्नेह तेरा, मांगता हूँ और क्या..?


घोलती है कान में बस, यूँ तेरी आवाज हरदम...
तुम न हो जो पास तो, फिर सांझ क्या, फिर भोर क्या...?


पूछता है दिल मुझी से, तुम कहो क्या चाहते हो....
मैं कहूँ क्या,कह सका ना, दिल में है क्या, जान में क्या...?


मैं तुझे मदिरालयों में ढूंढता-फिरता रहा हूँ....
तुम मिले तो सांझ क्या,जब ना मिले तो भोर क्या...?


सुन तेरी आवाज अब मैं, हर-तरफ पहचानता हूँ....
तुम रहो गुमसुम सदा, तो गीत क्या, फिर शोर क्या....?

1 टिप्पणी:

  1. पूछता है दिल मुझी से, तुम कहो क्या चाहते हो....
    मैं कहूँ क्या,कह सका ना, दिल में है क्या, जान में क्या...?
    मैं तुझे मदिरालयों में ढूंढता-फिरता रहा हूँ....
    तुम मिले तो सांझ क्या,जब ना मिले तो भोर क्या...?
    बहुत सुंदर और शानदार रचना लिखा है आपने ! ख़ूबसूरत भाव और अभिव्यक्ति के साथ लिखी हुई आपकी ये रचना काबिले तारीफ है ! हर एक पंक्तियाँ लाजवाब है!

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