रविवार, 22 नवंबर 2009

जिंदगी

जिंदगी ने बिखरने की साज़िश रची
पर वो अपनी हया से सँवरती रही..
देख दर्पण में उसके हया की अदब,
जिंदगी भी अदब से निखरती रही..!

मैंने इज़हार के जब तराने लिखे,
वो तरानों के कागज कुतरती रही..
मैं तो उसकी अदाओं से बेहोश था..
फिर भी वो दिल में चुपके उतरती रही....!

उसके दीदार के आशियाने में बन ,
के अपनी हया श्वांस भरती रही..
बेअदब होके "चंपक' की ये जिंदगी,
ख्वाहिशों के समंदर में तरती रही...

2 टिप्‍पणियां:

  1. Good one ,while writing your heart's true feeling looks to come with vivid colour making the true impact

    उत्तर देंहटाएं
  2. अच्छा लिखते हैं आप...लिखते रहें.
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं

ब्लॉग पर आने के लिए और अपने अमूल्य विचार व्यक्त करने के लिए चम्पक की और से आपको बहुत बहुत धन्यवाद .आप यहाँ अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर हमें अपनी भावनाओं से अवगत करा सकते हैं ,और इसके लिए चम्पक आपका सदा आभारी रहेगा .

--धन्यवाद !