मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

यौवन ...



धन्य-धन्य है मेरा मन देख के तेरा स्पंदन,
बहक रहे मेरे अंजन,छू लूं क्या ये तन-चन्दन..?


मचल रहा मेरा यौवन कहो लुटा दूं तन-मन-धन,
तेरे साँसों की खुशबु से ये पवन गूंजती है सन-सन..!


निशा नशे में झूम-झूमती चन्दन की बाहों में झन्न -झन्न,
नरम अधर के ही पराग में डूब भ्रमर करता  रस-गुंजन..!


नैन-नशीले गाल-गुलाबी होठों पे प्रियतम का चन्दन,
रति-प्रिया के अंग-अंग में झलक रहा मद-यौवन छन-छन..!

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

ब्लॉग पर आने के लिए और अपने अमूल्य विचार व्यक्त करने के लिए चम्पक की और से आपको बहुत बहुत धन्यवाद .आप यहाँ अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर हमें अपनी भावनाओं से अवगत करा सकते हैं ,और इसके लिए चम्पक आपका सदा आभारी रहेगा .

--धन्यवाद !